वास्तविकता से परे विज्ञापन:-

हम रोज अलग-अलग कम्पनी के प्रोडक्टस का इस्तेमाल करते हैं फिर चाहे वो ब्यूटी प्रोडक्टस हों या फूड प्रोडक्टस। हम सुबह से रात तक किसी न किसी ब्रांड से घिरे रहते हैं अगर फेशवॉश हिमालया का है तो नाइट क्रीम पॉडंस की होगी। लेकिन हम किसी भी चीज़ को खरीदने से पहले उसे विश्वसनीयता के तराजू पर जरूर तोलते हैं। हम ज्यादातर उन्हीं प्रोडक्टस का प्रयोग करते हैं जिनका प्रचार-प्रसार किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा किया जाता है।
दरअसल प्रोडक्ट बेचने वाली कम्पनी अक्सर किसी बड़ी बॉलीवुड हस्ती के द्वारा अपने सामान का प्रचार-प्रसार करवातीं हैं जिससे लोगों को लगता है कि जब इतने बड़े सेलिब्रेटी इसे इस्तेमाल कर रहे हैं तो ये प्रोडक्ट जरूर अच्छा होगा।कम्पनियों का ये सेलिब्रेटी फॉर्मूला काम भी करता है। लोग टीवी या रेडियो पर जब किसी सेलिब्रेटी को किसी चीज़ का विज्ञापन करते हुये देखते या सुनते हैं तो बहुत जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं और उस प्रोडक्ट को खरीदने में रूचि दिखाते हैं।

आज कम्पनियाँ अपनी टारगेट ऑडियन्स को समझ गयीं हैं। वो जानतीं हैं की उन्हें अपना प्रोडक्ट कैसे बेचना है। अब वे अपने विज्ञापनों में सेलिब्रेटीज के साथ-साथ छोटे बच्चों से भी अपने प्रोडक्ट का प्रचार करवाने लगीं हैं। कम्पनियाँ टारगेट ऑडियन्स के अनुसार ही अपने प्रचार का तरीका भी बदल रहीं हैं। अगर उन्हें अपना कोई फूड प्रोडक्ट बेचना हो तो वे इसका प्रचार बच्चों से करवातीं हैं और कोई ब्यूटी प्रोडक्ट बेचना हो तो किसी खूबसूरत बॉलीवुड एक्टरेस को ब्रांड एम्बासडर बना देतीं हैं।

जब यही सेलिब्रेटीज शैम्पू लगाकर अपने बाल लहराते हैं,चॉकलेट खाकर भूख मिटाते हैं और डीयू पीने के बाद पहाड़ों पर चढ़ जाते हैं तो लोग एकबार इनकी तरफ आकर्षित होते हैं। और ये संभावना बढ़ जाती है कि लोग उसे जरूर खरीदेगें। चाहे भले शैम्पू इस्तेमाल करने के बाद उनके बाल झड़ने लगें,चॉकलेट से पेट भी न भरे और डीयू पीकर पहाड़ों पर चढ़ना तो दूर की बात है। लेकिन लोग फिर भी उस प्रोडक्ट को खरीदने में दिलचस्पी दिखाते हैं क्योंकि उसके पीछे एक बड़ा नाम है,बड़े लोग हैं।

कम्पनियाँ ग्राहकों को कैसे भी अपना प्रोडक्ट बेचना चाहतीं हैं और लगभग वे इसमें वे सफल भी होतीं हैं।

इसी तरह एक उदाहरण है जिसमें पेप्सिको ने अपने Sting enegry drink के एड ब्रेक में दिखाया है कि एक लड़की की कार खराब हो जाती है और वो स्टार्ट नहीं होती ।तभी नहीं एक लड़का वहां आता है जो अपनी कार से Sting निकाल कर पीता है और डांस करने लगता है जिससे उसके अंदर करंट बनने लगता है।और वो बाद में अपने शरीर से कार की बैटरी चार्ज कर देता तो कार स्टार्ट हो जाती है। हम सब जाने है कि किसी भी ड्रिंक को पीने से ऐसी नहीं होता। लेकिन फिर भी लोगों अपनी एनर्जी डाउन लगती है तो वो सोचते हैं कि Sting पीने से बॉडी में एनर्जी आ जायेगी।
इसी तरह कई विज्ञापन हैं जो अपनी वास्तविकता से परे हैं।लेकिन लोग विज्ञापन को ठीक से समझते नहीं हैं और बस बड़े ब्रांड और बड़े सेलिब्रेटी को देख कर आंख मूंदकर कोई भी प्रोडक्ट खरीदने लेते हैं।
—-:आयुषी शाक्या

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स्कूलों में घट रही है छात्रों की संख्या…

पिछले दो- चार सालों में स्कूलों में बच्चों की घटती उपस्थिति चिंता का विषय है। आख़िर बच्चे स्कूलों क्यों नहीं जा रहे हैं? तो इसकी वजह कहीं न कहीं लर्निंग एप और कोचिंग सेंटर हैं।

आज ऑनलाइन कई सारे लर्निंग एप उपलब्ध हैं। इन एप की मदद से बच्चे ऑनलाइन जाकर किसी भी विषय को कभी भी पढ़ सकते हैं और समझ सकते हैं। ये लर्निंग एप बच्चों की मदद तो करते हैं साथ ही ऑफिस जाने वाले पेरेंट्स के लिये भी वरदान हैं। जो ऑफिस के काम के चक्कर में अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते।

बच्चे अच्छे नंबरों से पास हों इसके लिये उनके माता – पिता क्या-क्या नहीं करते। अगर किसी एक सब्जेक्ट में बच्चा कमजोर है तो हर सब्जेक्ट की कोचिंग लगवा देते हैं। वहीं कोचिंग टीचर से घर पर एक्स्ट्रा क्लासेस भी लगवा देते हैं।आज लगभग हर शहर में हजारों की संख्या में कोचिंग सेंटर खुले हैं। और कुछ सेंटर तो इतने फेमस हो गये है कि देश का हर बच्चा उसमें पढ़ना चाहता है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि ये कोचिंग सेंटर और लर्निंग एप बच्चों की पढ़ाई में मदद करते हैं। लेकिन इन दोनों के होने से कहीं न कहीं बच्चों का स्कूल के प्रति लगाव कम होता जा रहा है।

क्योंकि उन्हें लगता है कि स्कूल में पांच घंटे बैठने से अच्छा है कि एक घंटे की कोचिंग करके या एक घंटे का लर्निंग वीडियो देख कर पढ़ाई कर ली जाये। टाइम भी बचेगा और सब्जेक्टस ज्यादा अच्छे से समझ आयेगा।

एक कड़वा सच ये भी है कि आज जो टीचर स्कूल में पढ़ाते हैं वो अपना कोचिंग सेंटर भी चलाते हैं। वो स्कूल में पढने वाले बच्चों को नंबरों का लालच देकर अपनी कोचिंग में आने को कहते हैं। तो बच्चा भी सोचता है इस टीचर से स्कूल में पढने से अच्छा कोचिंग में पढ़ लिया जाये। कम से कम नंबर तो अच्छे आयेंगें।

और तो और जो बच्चे प्रतियोगी परीक्षा में पास होते हैं। उनकी देखा- देखी में भी बच्चा स्कूल से ज्यादा कोचिंग को महत्व देता है। क्योंकि उन्हें लगता है कि कोचिंग में पढ़ने वाले ही परीक्षा में पास हो सकते हैं।

बच्चों की स्कूल में कम उपस्थिति के जिम्मेदार जितने कोचिंगसेंटर और लर्निंग एप हैं उतने ही स्कूल के टीचर्स भी। क्या वो बच्चों को स्कूल में ही सही तरीके से नहीं समझा सकते। अपने थोड़े से लाभ के लिये बच्चों के अनमोल भविष्य से खिलवाड़ करते हैं।

——–Ayushi Shakya———-

अपने जेंडर से खुश नहीं हैं युवा….??

भारतीय संविधान में आर्टिकल 19(1) के तहत भारत के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गयी है।सभी को बोलने की आजादी,किसी भी वेश-भूषा को पहनने की आज़ादी, स्वयं को कैसे भी अभिव्यक्त करने की आज़ादी।

इस आर्टिकल का महत्वपूर्ण बिन्दु “स्वयं को कैसे भी अभिव्यक्त करने की आजादी (Right to expressions)” लोगों को ये स्वतंत्रता प्रदान करता है कि वो अपने -आप को जैसे चाहे, जिससे रूप में चाहे समाज के सामने पेश कर सकते हैं।

शायद इसी आर्टिकल को अपना हथियार बनाकर आजकल युवा अपने -आप को समाज के सामने उस रूप में प्रदर्शित कर रहें जो वास्तव में उनका है ही नहीं। कहने का मतलब है कि लड़कियां लड़कों की चाल-ढाल अपना रहीं है तो लड़के भी लड़कियों के हाव- भाव अपना रहें हैं।

लेकिन इसकी वजह क्या है? क्या युवा प्रकृति द्वारा दिये गये मानव शरीर से खुश नहीं हैं।मानाकि लोगों को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। और किसी को भी उस पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।

पिछले दिनों टिक-टॉक एप पर मैंने ऐसे कई युवाओं को देखा जो अपने जेंडर के विपरीत कपड़े और मेकअप करके वीडियोज बनाते हैं। बहुत से लोग उनके इस अंदाज को पसंद भी करते हैं।और बहुत से लोग उन्हें थर्ड जेंडर, किन्नर, हिजड़ा कह कर ट्रोल भी करते हैं।

एकबार तो लगता है कि लोग ज्यादा से ज्यादा लाईक्स और अपने फॉलोअर्स बढ़ाने के लिये कुछ अलग करने के चक्कर में ऐसा करते हैं। क्योंकि टिक-टॉक या ऐसे ही हर सोशल मीडिया एप लोग उन्हें ही पसंद करते हैं जो कुछ अलग करते हैं।

मानव शरीर तो प्रकृति की देन है। उसे बदला नहीं जा सकता। ये सब पुरानी बातें हो चुकी हैं आज लोग अपना जेंडर चेंज करवाने के लिये ऑपरेशन और प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेते हैं।

शायद आजकल युवा इसलिये अपने जेंडर से खुश नहीं है क्योंकि लड़कियों को लगता हो कि लड़कों की लाइफ उनसे ज्यादा अच्छी होती है,उन्हें हमसे ज्यादा फ्रीडम मिलती है। इसी तरह लड़कों को लगता हो कि सरकार और समाज केवल लड़कियों के विकास और वृद्धि की बात करता है तो लड़कियों की लाइफ उनसे ज्यादा अच्छी है।

लेकिन अगर युवाओं को ऐसा लगता है तो ने ये क्यों भूल जाते हैं कि सुख या दुख हमारे जेंडर से नहीं बल्कि हमारे कर्म से निर्धारित होते हैं।

लेकिन खुद को अपने जेंडर से अलग प्रस्तुत करना भी बड़ी चुनौती है। क्योंकि जरुरी नहीं समाज आपके हर क्रिया- कलाप को स्वीकार करे। और वो आपके इस कदम की प्रशंसा करे।

युवाओं का स्वयं को अपनी प्रकृति से भिन्न प्रसारित करना बड़ा सहसी कदम है ओर इसकी प्रशंसा होना भी चाहिये लेकिन अगर ये केवल लाईक्स और पापुलर होने का तरीका है तो इस पर युवाओं को विचार करने की आवश्यकता है।

———-Ayushi shakya————

शिला पर कला

रंगों का काम है हर बेरंग चीज़ में रंग भरना। फिर चाहे वो कैनवास हो या जिदंगी,बस रंग का एक स्ट्रोक ही काफी है दोनों को रंगीन करने के लिये।

इन रंगों ने अच्छे-अच्छे बेरंगों को रंगीन किया है। जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते। रंगों ने कागज़,कपड़े ही नहीं पत्थरों को भी सजीव कर दिया है।

Stone age painting:-

आजकल पत्थरों पर भी पेटिंग की जा रही हैं।लेकिन ये कला आज से नहीं बल्कि 50,000 साल पूर्व से है। पाषाण युग में मनुष्य धूप,आंधी- तूफान, बारिश और जंगली जानवरों से बचने के लिये कन्दराओं (गुफाओं) में रहता था। वह गुफाओं की दीवारों पर नुकीली चीज़ से मानव व जानवरों की आकृतियाँ उकेरता था।

Ellora cave, Maharashtra:-

अपने निवास स्थलों को पहचानने के लिये तथा उन्हें भीतर से सजाने के लिये वह शिलाओं पर चित्रकारी करता था। मध्य प्रदेश में स्थित भीमबटेका की गुफाओं और महाराष्ट्र में एलोरा की गुफाओं में शिलाओं पर चित्रकारी देखी जा सकती है। कलाकृतियों को पत्थरों पर उकेरने के लिये मनुष्य कच्चे कोयले,पौधों के रस, हेमेटाइट( हड्डी की राख) का प्रयोग करता था।

पहले राजा भी अपने आदेशों को पत्थरों पर खुदवाते थे। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिये 33 शिलालेख खुदवाये थे। जिसके अवशेष भारत,नेपाल,पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ्गानिस्तान में मिले।

Shiva idol in Ellora caves:-

हालांकि पत्थरों को काटकर मूर्तियां भी बनायी जाती हैं, लेकिन स्टोन पेटिंग इससे बिलकुल अलग है। इसमें पत्थरों पर एक्रीलिक पेंट से कलर किया जाता है। जो पत्थरों को चमकदार बना देता है।

पेंट होने के बाद पत्थर बिलकुल सजीव लगने लगता है मानों किसी ने उसमें जान फूंक दी हो। कौन कहता है पत्थरों पर फूल नहीं खिल सकते? रंगों ने तो इसे भी मुमकिन कर दिखाया है। पत्थरों, कंकड़ों पर फूल, फल, पक्षियों,जानवरों से लेकर मोटिवेशनल कोट्स भी लिखे जा सकते हैं।

स्टोन पेटिंग की शुरूआत:-

अमेरिका में 2015 में The kindness rocks project के नाम से एक प्रोजेक्ट स्टार्ट हुआ था। इसमें लोग पत्थरों पर मोटिवेशनल कोट्स लिखकर beach में छोड़ देते थे। और उनके दोस्त या रिश्तेदार उसे ढूँढ़ते थे। फिर इसी तरह वो लोग भी पत्थरों पर कुछ लिखकर छोड़ देते थे।

बच्चों में ये एक खेल की तरह ट्रेंड में आया और उनके लिये एक मज़ेदार एक्टिविटी थी। साल 2015 Megan Murphy ने इस प्रोजेक्ट को स्टार्ट किया था। उन्होंने एक पत्थर पर “you’ve got this” लिखकर cape cod beach पर छोड़ दिया था । जिसके बाद उनकी एक दोस्त को ये मिला और उन्होंने इसे आगे बढ़ाया।

अमेरिका के बाद ये ट्रेंड Britain,Newzland,और Australia में भी फेमस हुआ। हर साल 3 July को “International drop a rock day” मनाया जाता है ।लोग beach पर पत्थरों पर मोटिवेशनल कोट्स लिखकर छोड़ देते हैं।

——–Ayushi Shakya———

……नमूनों की क्लास……

क्लास केवल ब्लैक बोर्ड और बैंच से मिल कर नहीं बनती…वो बनती है कुछ चिरकुट,चटपटे और चटकोलेदार लोगों से…

जिनमें से एक बहुत शांत मिजाज़ का होता है …तो दूसरा भोंपू की आवाज़ सा होता है।

एक शक्ल से सुशील होता है…..दूसरा हर बात की खाल निकालने वाला वकील होता है।

कोई फैशन की पूरी दुकान होता है… तो कोई ठेठ बनारसी पान होता है।

कोई दिलफेंक आशिक़ होता है…. तो कोई महीने में एक बार दर्शन देने वाला मासिक होता है।

क्लास में लैला-मज़नू भी होते हैं जो एक-दूसरे के इश्क़ में जलते हैं …….एक रात का जुगनू भी होता है जो दूसरों के लिये जलता है।

कोई हज़र वक्त का श़ायर होता है…..’हम तो पक्का फेल हो जायेगें’ ऐसा कहने वाला एक क़ायर भी होता है।

कुछ दिन के उल्लू होते हैं……और कुछ टीचर की हर बात पर “क्या सर?” कहने वाले लल्लू भी होते हैं।

क्लास में एक चचा भी होते हैं पर without चाची……

——Ayushi Shakya———

डांस एक आर्ट है…..

“डांस एक आर्ट है ,आर्ट है,”हैप्पी न्यू ईयर मूवी में दीपिका का ये डायलॉग तो आपको याद ही होगा…

बेशक नृत्य एक कला है। पर यही डांस किसी की खुशी इज़हार करने का तरीका है, किसी के लिये रोजी-रोटी है, किसी का स्ट्रेस बस्टर है, किसी के लिये पूजा है डांस।

कौन कहता है कि डांस के लिये म्यूजिक की जरूरत है, स्टेप्स की जरूरत है? डांस करने के लिये आपको केवल और केवल खुश होने की जरूरत है।

क्योंकि हम नाचते तो तब भी हैं जब हमारे पास म्यूजिक नहीं होता,डीजे लाइटस नहीं होती। होती हैं केवल हमारी खुशियां। जी हां बिलकुल, जब हमारा पेपर अच्छा जाता है,जब कोई विश पूरी हो जाती है तो हम कैसे नाचने लगते हैं वो भी बिना म्यूजिक के, बिना किसी स्टेप के, बिना किसी डीजे लाइट के।

उस समय केवल हमारी खुशी ही हमारा म्यूजिक है,हमारी डीजे लाइट है, हमारा डांस स्टेप है।

हम लोग फिर भी शादी या बर्थडे पार्टी में बॉलीवुड सांग्स पर ही डांस करते हैं। पर आपने कभी पक्षियों को देखा है, वो कैसे बिना किसी गाने के ,बिना किसी स्टेप के बस मलंग होकर पंख पसारते हैं और नाचना शुरू कर देते हैं।

और उन्हें न तो हमारी तरह ये चिंता होती है कि कोई उनके डांस को देखेगा तो क्या कहेगा। वो बस अपनी अठखेलियां करने में मस्त रहते हैं।

बारिश के मौसम में मोर जैसे ही आसमान में घटा घिरते देखता है वैसे अपने पंखों को फैलाकर थिरकने लगता है क्योंकि उसे बादलों के आने की खुशी होती है।

वैसे पानी में रहने वाले पक्षी भी कम नहीं होते वो भी खुश होकर “पानी वाला डांस” करते हैं। कभी देखा है बत्तखों को पानी में नाचते हुये… कैसे वो अपने पंखों को पानी में झटकते हुये नाचती हैं। पूरे तालाब के पानी में छपछपाकर उसे भी अस्थिर कर देतीं हैं।

पानी भी ऐसी हिलोरें मारने लगता है मानों बत्तखों के छेड़ दिये जाने पर नाच रहा हो। कितना अलग है ना इनके खुश होने का तरीका।

लेकिन जब हम खुश होते हैं तो केवल नुकसान ही करते है, तेज आवाज़ में म्यूजिक बजाकर। हमारी खुशी किसी का सिरदर्द बन जाती है।

पर इन मासूम पक्षियों की खुशियाँ न तो किसी को नुकसान पहुंचातीं हैं और न ही सिरदर्द बनती हैं।

-:Ayushi Shakya

मियां बीवी राज़ी पर नाराज़ हैं पिताजी….👿👿

“जब मियां – बीवी राज़ी … तो कुछ नहीं कर पायेगा काजी” अभी हाल ही के दिनन मा एकौ ख़बर बड़ी तेजी से सोशल मीडिया से लेकर टेलीबिज़नवा पर छायी रहै। कि देश की कौनो बड़ी पार्टी कैर सांसद की बिटिवा आपन प्रेमी साथै चलै गईल रहै। “भाग गयै रहैं “इसलिये नाहीं बोलब काहै कि बिटिवा और बिटवा दोनों जन बालिग रहैं। दोनों जन बहुतै निक तरीका से जानत रहैं कि दोनों जन का कर रहे हैं। अब बवाल ई बात का है कि जो बिटिवा रही वो थी पंडित और बिटवा रहैं दलित जाति कैर….बस यही बात बिटिवा के पिता जी को जमी नाहीं और हो गईल बैर। प्रेमी के साथै चलै जाने की बात तो ठीक बा पर मामला तब और गरमा गईल जबै बिटिवा ने आपन और आपन प्रेमी की सेफ्टी ख़ातिर फेसबुकवा पर एकौ वीडियो पोस्ट कर डाला।और आपन पिताजी से पीछा न करै ख़ातिर गुहार लगायी। पोस्टवा वायरल होने मा तनिकौं भी देर नाहीं लगी ।और बाकि का बचा काम जो रहैं वो टीआरपी की भूखी-प्यासी मीडिया कर डारिस। अब इंडियन टेलीबिज़नवा पर बिटिवा आपन पिताजी से कह रहीं हैं आप क्वेशचनियाईये हम आंसरियायेगें।अरे जब सबैन क्वेशचन का आंसर देना ही था तो परीक्षा हाल (घर) में दें देती क्वेशचन पेपर (प्रेमी) को लेकर टेलीबिज़नवा पर जाने की जरूरत का रही। खैर ई तो सबैन लोग जानत हैं कि प्रेमी चाहे पंडित जाति कैर हो या दलित जाति कैर बिटिवा के पिताजी को आपत्ति होत ही है। फिर बिटिवा चाहे डायमंडवा सा लड़का काहै न ढूँढ के ले आये… पिताजी को तो आपन ढूँढा दूल्हा ही अनमोल लागत है। हालांकि ई मा कोई दोराय नाहीं है कि सांसदवा की बिटिवा बहुतै डेयरिंग काम की हैं दलित बिटवा से ब्याह करके और इंडियन टेलीबिज़नवा पर आपन पिताजी से आपन प्यार ख़ातिर लढ़कै। सांसदवा जी कैर पासै एकौ मौका रहै दलित और सवर्ण जाति के बात का भेदभाव मिटाने का पर सांसदवा जी ने एक नेता की तरह न बिचार कर एकौ सामाजिक व्यक्ति की तरह से बिचारै शायद। जो एकौ ऐसे समाज मा रहत हैं जो आपन सोच नाहीं बदलना चाहत है। सुनने में आया है कि बिटिवा रहैं जर्नलिज्म के स्टूडेंट मीडिया तो वो की ताकत से निकी तरह से परिचित रहैं। तबहिं तो पहले सोशल मीडिया का सहारा लिया बाद में मीडिया वालों ने खुद ही सहारा दे दिया। जब पिताजी हों नेता और बिटिवा हो जर्नलिज्म की ज्ञाता…. तो फिर …..इसमें तेरा घाटा मेरा कुछ नहीं जाता। जय हो जर्नलिज्म….✒️✒️✒️📺📺📺